राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण- पुलिस भ्रष्टाचार, कदाचार तथा अकार्यक्षमता के खिलाफ न्यायसंस्था
हिंदी क़ानूनी मार्गदर्शन

राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण- पुलिस भ्रष्टाचार, कदाचार तथा अकार्यक्षमता के खिलाफ न्यायसंस्था

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पुलिस प्रशासन नागरिकों के संविधानद्वारा दिये मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए ताकतवर प्रशासन होने की वजह से वह किसी भी देश की प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक निकाय है. हालाँकि, पुलिस बल को मिले अमर्यादित अधिकार और उस पर निगरानी करने हेतु तटस्थ और प्रभावी न्याय तंत्र के अभाव में भारत में पुलिस प्रशासन नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में दुर्भाग्यवश पूरी तरह से विफल हो गया है. आम जनता का पुलिस प्रशासन पर से विश्वास पूरी तरह उड़ चुका है जो देश के लिए भयावह है.

 

कम तनख्वाह तथा सरकारी अनास्था पुलिस के भ्रष्टाचार, कदाचार तथा अकार्यक्षमता का समर्थन नहीं कर सकता-
यह लेख को लिखने से पहले, एक बात स्पष्ट है, कि पुलिस बल पर भारी राजनैतिक दबाव, वेतन की कमी और पुलिस के हित के लिए सरकार के तरफ से भारी अनास्था को कई बार देशवासियों के सामने विविध संस्थाओंद्वारा उजागर किया गया है. कई न्यूज चॅनलों में पुलिस को सरकारद्वारा उपलब्ध किये गए खस्ता हाल घरों या क्वार्टर की हालत देखकर सरकार पुलिस प्रशासन के साथ जानवरों जैसा ही बर्ताव करती है ऐसा भयानक वास्तव भी सामने आ चुका है.

हालांकि, उपरोक्त कारण किसी भी हाल में पुलिस बल की अकार्यक्षमता, कदाचार तथा भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि इससे भी कई गुना विदारक और खराब परिस्थितियों में बिना कुछ अपेक्षा किये देश के लिए कई क्रांतिकारियों ने आपने प्राण न्योछावर किये है. जब बात राष्ट्र सेवा तथा जनता की मौलिक अधिकारों की रक्षा की आती है तो ऐसे वक्त में अपना स्वार्थ देखना या यह एक तरह से राष्ट्रद्रोह ही है. ऐसे में पुलिस प्रशासन के कुछ इमानदार पुलिस अधिकारी तथा आपातकालीन परिस्थितयों में देशवासियों के लिए शहीद होनेवाले पुलिस अधिकारीयों का आदर रखकर यह लेख सार्वजनिक किया जा रहा है.  संगठन के अंग्रेजी मूल लेख के हिंदी आवृत्ती सार्वजानिक कर रहें है, अंग्रेजी लेख की लिंक नीचे दे रहें है-
Police Complaints Authority- Legal Remedy Against Corrupt & Inefficient Police
इसी लेख का मराठी भाषा में भी अनुवाद किया गया है उसकी लिंक-
पोलिस तक्रार निवारण प्राधिकरण- भ्रष्ट व अकार्यक्षम पोलीस अधिकारींविरोधात न्यायसंस्था  

पुलिस प्रशासन सुधार का इतिहास संक्षेप में-
सन २००६ में पुलिस प्रशासन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक और ऐतिहासिक हस्तक्षेप से पहले, सरकार सन १९७७ से केवल विभिन्न समितियों का गठनही कर रही थी. एक के बाद एक कई समितियों ने अपनी रिपोर्ट सरकार के सामने रखीं लेकिन उस पर बजाय दूसरी समिति गठित करने के अलावा किसी भी सरकार ने कोई ठोस कार्यवाही नहीं कीं. इन समितियों में से महत्वपूर्ण समितियाँ थीं-
राष्ट्रीय पुलिस आयोग (१९७७-१९८१),
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
विभिन्न कानून समितियां,
रिबेरो समिती,
पद्मनाभाई समिती,
मलीमथ समिति ई.
इतनी समितियाँ गठित करने के बाद भी मानो सरकार का समाधान न होने पर आखिरकार सरकार द्वारा सन २००५  में पुलिस प्रशासन में सुधार हेतु संशोधन करने के लिए फिर से नए सिरे से सोराबजी समिति नियुक्त की गई, ताकि समितियों और उनके सुझावों पर काम किया जा सके!

अंत में, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप, देशभर में राज्य तथा जिलास्तरीय पुलिस शिकायत निवारण प्राधिकरण का गठन करने का आदेश-
एक तरफ, जहा पुलिस सुधार के प्रति सरकार की गंभीर अनास्था थी और वह जानबुझकर देरी की रणनीति अपना रही थी वहीँ दूसरी तरफ कुछ सामाजिक संस्थाओं और सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने सन १९९६ में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें पुलिस सुधार को लेकर सर्वोच्च न्यायलयद्वारा हस्तक्षेप की मांग की गई. यह याचिका भी दुर्भाग्यवश १० साल से प्रलंबित रह गई.

मात्र अंत में इस मामले में समग्र स्थिति का संज्ञान लेने के बाद और सन २००६ में विभिन्न समितियोंद्वारा ‘धोके की घंटी’ की हालत सार्वजानिक करने पर आखिरकार सर्वोच्च न्यायलयने सन २००६ में Prakash Singh & Ors vs Union Of India, on 22 September, 2006 (Writ Petition No.310/2016) इस रिट याचिका में संविधान के अनुच्छेद ३२ में अपने प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए ७ सूत्रीय निर्देश देश के सभी केंद्र तथा राज्य सरकारों को जारी किये, जिसके द्वारा ३१ दिसंबर २००६ के पहले राज्य स्तर पे तथा जिला स्तरों पे पुलिस शिकायत प्राधिकरण गठित करने के आदेश दिए गए. इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालयने अपने निर्देशों को संविधान के अनुच्छेद १४२ अंतर्गत घोषित किया जिसका मतलब यह देश के हर केंद्रीय तथा राज्य सरकारों पर बाध्यकारी होंगे और यह आदेश न मानने पर संबंधित राज्य अथवा केंद्र सरकार को अदालत की अवमानना ​​के लिए दंडित किया जा सकता है.
उपरोक्त संदर्भीय सर्वोच्च न्यायलय का २२ सितंबर २००६ का आदेश आप निचे दी हुई लिंक से देख सकते है तथा डाउनलोड कर सकते है-
Prakash-Singh-Ors-vs-Union-Of-India-And-Ors-on-22-September-2006

सर्वोच्च न्यायलय के उपरोक्त संदर्भीय निर्णय की मुख्य विशेषतायें-
उपरोक्त संदर्भीय सर्वोच्च न्यायलय के ७ सूत्रीय निर्णय की विशेषताओं में से महत्वपूर्ण विशेषतायें निम्नलिखित है-
देशभर में ‘पुलिस शिकायत प्राधिकरण’ की स्थापना
पुलिस अधिकारियों के भ्रष्टाचार, कदाचार तथा अकार्यक्षमता के खिलाफ शिकायतों की जांच करने के लिए पुलिस अधीक्षक रैंक के निचे के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की संज्ञान लेने के लिए जिला स्तर पर एक पुलिस शिकायत प्राधिकरण गठित होगा तथा पुलिस अधीक्षक रैंक के ऊपर के पुलिस कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, कदाचार तथा अकार्यक्षमता के खिलाफ शिकायतों का संज्ञान लेने के लिए राज्य स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरण गठित किया जायेगा. जिला पुलिस शिकायत प्राधिकरण के अध्यक्ष जिला स्तर से निवृत्त न्यायाधीश तथा राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के अध्यक्ष  न्यायालय के निवृत्त न्यायाधीश होंगे.

‘जांच विभाग’ और ‘कानून एवं सूव्यवस्था’ संभालनेवाली शाखायें अलग होंगी-
पुलिस प्रशासन का जांच विभाग तथा कानून एवं व्यवस्था संभालनेवाली शाखायें पूरी तरह से अलग कर दी जायेंगी ताकि दोनों व्यवस्थायें स्वतंत्र रूप से काम कर सकें और उनपर अतिरिक्त दबाव ना हो.
पुलिस तबादले में राजनितिक हस्तक्षेप ख़त्म करने के लिए स्थापना बोर्ड का गठन-
पुलिस तबादलों में राजनितिक हस्तक्षेप कम करने तथा प्रशसान में सुसुत्रता ने के उद्देश से हर राज्य में स्थापना बोर्ड का गठन किया जायेगा जो पुलिस प्रशासन में तबादले आदि विषयों पर नियंत्रण रखेगा.

गंभीर अपराधों का संज्ञान लेना-
इसके अंतर्गत पुलिस क्रूरता, अत्याचार जैसे:-
अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखना,
पुलिस हिरासत में गंभीर चोट पहुंचाना या मृत्यु,
पुलिस हिरासत में बलात्कार की कोशिश या बलात्कार करना,
या अन्य कोई अपराध जिसमें अवैध शोषण, घर अथवा जमीन हड़पना,
या अन्य कोई घटना, जिसमें पद अथवा शक्तियों का दुरूपयोग किया गया हो आदि किसी भी प्रकार का कोई भी अत्याचार या क्रूरता पुलिस के द्वारा की गई हो,
ऐसे गंभीर संज्ञान हेतु ‘पुलिस शिकायत प्राधिकरण’ की स्थापना राज्य तथा जिलों के स्तर पर की जाएगी.

उदाहरणसहित स्पष्टीकरण-
उपरोक्त संदर्भीय सर्वोच्च न्यायलय का आदेश किस तरह से अमल में लाया जाना चाहिए और वो किस तरह आप ले राज्य में प्रतिबिंबित होगा ये आम जनता को समझने में आसानी हो इसलिए उदहारण के तौर पर हम हरियाणा राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन और उसके बारे में अन्य जानकारी दे रहें है. अन्य राज्य के वाचक अपने राज्यों के राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण की जानकारी सरकारी वेबसाईट तथा सरकार को सुचना के अधिकार कानून अंतर्गत आवेदन कर के जानकारी प्राप्त कर सकते है. याद रहें, अगर आप के राज्य सरकार ने राज्य तथा आप के जिले में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन नहीं किया है तो वह न्यायलय के अवमानना के अपराध के दंडित किये जा सकते है, और यदि आप के सरकारने अभी तक पुलिस शिकायत प्राधिकरणका गठन नहीं किया है तो इसके खिलाफ आप न्यायालयीन अवमानना की याचिका दाखल करें या अपने राज्य के उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश को जरुर शिकायत करें.

हरियाणा राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण-
हरियाणा सरकारने राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के लिए ख़ास तौर पर वेबसाईट निर्मित की है जिसकी  निम्नलिखित लिंक है-
http://spcahry.nic.in/hindi/index.html
पता-
राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण
हरियाणा
पुराना लोक निर्माण (बी एंड आर) भवन,
सैक्टर 19-बी, चण्डीगढ़ – 160019
दूरभाष/फैक्स नम्बर: 0172 2772244
कार्यालय समय :- पूर्वाहन् 9 बजे से 5 बजे अपराहन् तक (हरियाणा राज्य के कैलंडर अनुसार)
शिकायत हेतु:
ई-मेल : spca.haryana@nic.in
सुझाव हेतु: –
ई-मेल: spcaopinion@gmail.com

गठन-
हरियाणा राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण, का गठन राज्य सरकार द्वारा हरियाणा पुलिस अधिनियम २००७ के अन्तर्गत दिनाँक १६.०८.२०१० को किया गया. श्री राम निवास, भारतीय प्रशासनिक सेवा (सेवानिवृत) को राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण नियुक्त किया गया है. हरियाणा पुलिस अधिनियम २००७ की धारा ६५ के अन्तर्गत यह प्राधिकरण पुलिस कार्मिक के विरूद्ध गम्भीर कदाचार के आरोपों की या तो स्वप्रेरणा से या निम्नलिखित में से किसी से शिकायत प्राप्त होने पर जाँच करेगाः-
(क) पीड़ित या शपथ-पत्र पर उसकी ओर से किसी व्यक्ति द्वारा,
(ख) राष्ट्रीय या राज्य मानव अधिकार आयोग.

प्राधिकरण की शक्तियाँ-
प्राधिकरण द्वारा जांचे गये मामलों में उसे सिविल प्रकिया संहिता १९०८  (१९०८ का अधिनियम ५), के अधीन वाद का विचारण करने के लिए तथा विशिष्टया निम्नलिखित मामलों के संबंध में सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगीः-
(क) साक्षियों को समन करना तथा हाजिर कराना तथा उनकी परीक्षा शपथ पर करना;
(ख) किसी दस्तावेज को प्रकट करना तथा प्रस्तुत करना;
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना;
(ड) साक्षियों या दस्तावेजों के परीक्षण के लिए प्राधिकार देना; तथा
(च) यथाविहित कोई अन्य मामला.
राज्य सरकार कारवाई करने पर बाध्य-
प्राधिकरण जांच पूरी होने पर राज्य सरकार को अपना निर्णय प्रेषित करेगा. राज्य सरकार प्राधिकरण के निर्णयों तथा सिफारिशों पर विचार करेगी तथा उचित कार्रवाई करेगी.

अधिकार क्षेत्र-
६५. (१) प्राधिकरण पुलिस कार्मिक के विरूद्ध नीचे तथा विस्तृत ‘‘गम्भीर कदाचार’’ के आरोपों की या तो स्वप्रेरणा से या निम्नलिखित में से किसी से शिकायत प्राप्त होने पर जाँच करेगाः-
(क) पीड़ित या गृहीत शपथ-पत्र पर उसकी ओर से किसी व्यक्ति,
(ख) राष्ट्रीय या राज्य मानव अधिकार आयोग.
व्याख्याः- इस अध्याय के प्रयोजन के लिए ‘‘गम्भीर कदाचार’’ से अभिप्राय होगा पुलिस अधिकारी का कोई कृत अथवा अकृत जो निम्नलिखित की ओर ले जाता है या समझी जाती हैः-
(क) पुलिस हिरासत में मृत्यु;
(ख) बलात्कार या बलात्कार करने का प्रयास
(ग) पुलिस हिरासत में गहरी चोट
परन्तु प्राधिकरण केवल ऐसी गिरफ्तारी या निरोध की शिकायत की जाँच करेगा, यदि उसकी शिकायत की सत्यता के बारे में प्रथम दृष्ट्या संतुष्टि हो जाती हैः
परन्तु यह और कि कोई भी गुमनाम, समानार्थक तथा कृतकनाम शिकायतें ग्रहण नहीं की जाएंगी.
अवैध हिरासत में रखना,
पदीय दुरूपयोग ई.

(2) प्राधिकरण पुलिस महानिदेशक या राज्य सरकार द्वारा इसे निर्दिष्ट किसी अन्य मामले की भी जाँच कर सकता है।

हरियाणा राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण शिकायत कैंसे करे-
शिकायतकर्ता अपनी शिकायत कार्यालय की ई-मेल पर भेजना चाहता है तो उसको यह सुविधा उपलब्ध है कि वह अपनी शिकायत कार्यालय की ई-मेल spca.haryana@nic.in पर भेज सकता है. लेकिन यह शिकायत भेजने के एक सप्ताह के अन्दर उसे दिए हुए फार्म में शपथ पत्र तथा अपने पहचान व रिहायश के पहचान पत्र की सत्यापित प्रतिलिपि व्यकितगत रूप से या पत्राचार द्वारा प्राधिकरण कार्यालय को भेजनी होगी अन्यथा उस शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं कि जायेगी. यह प्रावधान गुमनाम तथा छद्‌म नाम शिकायत न हो उसे रोकने के लिए किया गया है।

शिकायतकर्ता अपनी शिकायत दिए गए प्रारूप (प्रारूप -I) के अनुसार भेज सकता है लेकिन शिकायत के साथ अपना हलफनामा (जो प्रारूप -II में दिया गया है) जरूर संलग्न होना चाहिए.
प्रारूप I और II डाउनलोड करने के लिए निम्नदर्शित लिंक देखें-
http://spcahry.nic.in/hindi/forms.html

अन्य आयोग तथा प्राधिकरण का विकल्प-
इस तरह से आम जनता पुलिस के भ्रष्टाचार, कदाचार तथा अकार्यक्षमता के खिलाफ क़ानूनी रूप से जिन्हें न्यायलय में जाना संभव नहीं है, तो बिना अधिवक्ता नियुक्त किये खुद व्यक्तिशः राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण अथवा अपने जिले के पुलिस शिकायत प्राधिकरण के पास शिकायत कर के न्याय प्राप्ती कर सकते है.  इसके अलावा जनता के पास मानवी हक्क आयोग, महिलाओं तथा बच्चों के अपराधों के प्रकरणों में महिला आयोग तथा बाल हक्क संरक्षण आयोग को भी संपर्क किया जा सकता है. ऐसे प्राधिकरण तथा आयोग में सुनवाई में देरी जरुर होती है लेकिन न्यायलय या जन आन्दोलन ना कर सकने की स्थिति में ऐसे आयोग तथा प्राधिकरण के पास जरुर संपर्क करना चाहिए, कुछ भी ना करने से अच्चा कुछ प्रयास करना हमेशा उचित होता है, जयहिंद!

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-ॲड.सिद्धार्थशंकर शर्मा
संस्थापक अध्यक्ष- भारतीय क्रांतिकारी संगठन

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