लोकसेवक आपराधिक अभियोजन क़ानूनी प्रावधान न्यायालयीन निर्णय दंड संहिता १९७३
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लोकसेवक के आपराधिक अभियोजन से संबंधित कानूनी प्रावधान और न्यायालयीन निर्णय

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लोकसेवक के आपराधिक अभियोजन से संबंधित कानूनी प्रावधान और न्यायालयीन निर्णय-(Legal provisions & Case Laws Related to Criminal Prosecution of Public Servant-Hindi)-
आम तौर पर किसी भी लोकसेवक के खिलाफ पुलिस प्रशासन आपराधिक अभियोजन दर्ज करने से मना कर देती है और आम जनता को इसके हेतु पहले सरकार से मंजूरी तथा अनुमती (sanction from the government) लाने की मांग करती है. इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता १९७३  की धारा १९७ के प्रावधान (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973)  का संदर्भ दिया जाता है जिसमें आम तौर पर कहा गया है की किसी भी लोकसेवक के खिलाफ आपराधिक अभियोजन दर्ज करने से पहले वह लोकसेवक जिस सरकार के अधीन नियुक्त किया गया है उसकी अनुमती (sanction from the government) लेनी अनिवार्य है.

न केवल पुलिस प्रशासन बल्कि कई बार अदालतों में भी इस प्रावधान का संदर्भ देकर कई याचिकायें ख़ारिज कर दी जाती हैं और इसीलिए आम जनता में इस प्रावधान को लेकर काफी संभ्रम है जिसकी वजह से लोकसेवक तथा सरकारी अधिकारीयों के खिलाफ अपराधिक अभियोजन से संबंधित कानूनी प्रावधान और न्यायालयीन निर्णयों की जानकरी आम जनता के लिए संगठनद्वारा सरल शब्दों में इस लेखद्वारा निम्नलिखित स्वरुप में जाहिर की जा रही है.

हालाँकि क़ानूनी तौर पर यह बात सर्वोच्च न्यायलय ने स्पष्ट कि है कि यदि लोक सेवक या तो अपनी प्रत्यक्ष कार्यवाही से या अप्रत्यक्ष कृत्य तथा क़ानूनी प्रावधानों की जानबूझकर अवज्ञा करता है जिसके परिणामस्वरूप कोई अपराध होता है या वो इस तरह आपराधिक साजिश में भाग लेता है, तो वह आपराधिक अभियोजन से बचने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा १९७ का (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) संरक्षण नहीं ले सकता है!

जिसका सरल भाषा में मतलब यह है कि अगर लोकसेवक तथा सरकारी कर्मचारी अगर अपने कर्तव्यों के परिसीमाओं से बाहर जाकर कोई अपराध या आपराधिक साजिश करता है तो पुलिस या अदालतों को उसके खिलाफ संबंधित सरकारसे आपराधिक अभियोजन के लिए मंजूरी या अनुमती (sanction from the government) प्राप्त करनी अनिवार्य नहीं होगी और वह उसके खिलाफ तुरंत आपराधिक अभियोजन प्रारंभ कर सकते हैं.

क्या है  दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा १९७ का संरक्षण?-
इस मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए सबसे पहले हम दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा १९७ (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) के पहले निम्नलिखित अनुच्छेद को देखेंगे, जिसके द्वारा लोकसेवक के खिलाफ अपराध के संज्ञान से पहले राज्य सरकार से मंजूरी तथा अनुमती (sanction from government) लेना का अनिवार्य है-

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लोकसेवक आपराधिक अभियोजन क़ानूनी प्रावधान कानूनी प्रावधान और न्यायालयीन निर्णय दंड संहिता १९७३
लोकसेवक के आपराधिक अभियोजन से संबंधित कानूनी प्रावधान और न्यायालयीन निर्णय


जैसा की पहले अनुच्छेद में स्पष्ट किया गया है लोक सेवक को यह संरक्षण केवल उसके उस कार्य के लिए है जो वह उसके पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कर रहा था.

लोकसेवक को पदीय कर्तव्य के निर्वहन के कार्यों के लिए ही दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ के धारा १९७ का संरक्षण मिलेगा अन्यथा नहीं- सर्वोच्च न्यायालय-
धोखाधड़ी करना या फर्जी दस्तावेज़ बनाना लोकसेवक का आधिकारिक कर्तव्य नहीं है-सर्वोच्च न्यायालय-
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Inspector of Police and Anr. v. Battenapatla Venkata Ratnam and Anr.  इस प्रकरण में अपने फैसले में कहा है कि धोखाधड़ी करना या फर्जी दस्तावेज़ बनाना लोकसेवक का आधिकारिक कर्तव्य नहीं है और ना ये अपराध उसके पदीय कर्तव्य के निर्वहन के श्रेणी में (official discharge of duties of public servant) आता है और इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता १९७३  की धारा १९७ (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) का संरक्षण लोकसेवक को ऐसे प्रकरण में नहीं मिलेगा.

निम्नदर्शित लिंक के माध्यम से आप उपर्युक्त संदर्भीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को डाउनलोड कर सकते हैं-
Inspector of Police and Anr. v. Battenapatla Venkata Ratnam and Anr.Pdf

इसे और आसान शब्दों  स्पष्ट करना हो तो-
यदि किसी भी शिकायतकर्ता को  पता चल जाता है कि किसी भी लोकसेवक ने अपनी प्रत्यक्ष कार्रवाई से या अपने अप्रत्यक्ष कृत्य तथा क़ानूनी प्रावधानों की जानबूझकर अवज्ञा की  है जिसके परिणामस्वरूप कोई अपराध होता है या वो इस तरह आपराधिक साजिश में भाग लेता है,  तो वह दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा १९७ (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) का संरक्षण नहीं ले सकता है और स्थानीय पुलिस स्टेशन या संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत को ऐसे अपराध का संज्ञान लेना चाहिए और ऐसे मामलों में संबंधित सरकारों से आपराधिक अभियोजन के लिए मंजूरी तथा अनुमती (sanction from the state government) प्राप्त करना अनिवार्य नहीं होगा!
सर्वोच्च न्यायालय – एक लोकसेवक, जो सरकार की अनुमति के बिना अपनी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है उसी को दंड प्रक्रिया संहिता १९७३  की धारा १९७ दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 197 तहत संरक्षित किया जाएगा ना की हर लोक सेवक को-
उपर्युक्त संदर्भीय आदेश में सर्वोच्च न्यायलय ने ये तो साफ़ कर दिया की कोई भी लोकसेवक उसके पदीय कर्तव्य के निर्वहन के श्रेणी में (official discharge of duties of public servant) के बाहर जाकर किसी अपराध में सामिल होता है या षड्यंत्र रचता है तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता १९७३  की धारा १९७ (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) का संरक्षण नहीं मिलेगा.

इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायलय ने हाल हीं में ३० अप्रैल २०१९ को  Miglani Vs State NCT Of Delhi (Criminal Appeal No.744 Of 2019) इस प्रकरण में अपने फैसले में कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता १९७३  की धारा १९७ (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) का संरक्षण उस लोकसेवक को ही मिलेगा जिसे सम्बंधित सरकार की अनुमति के बिना उसकी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है और ना की हर लोकसेवक को जो सरकार में काम करता हो. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उस बैंक के प्रबंधक को जमानत देने से इनकार कर दिया जो यह साबित नहीं कर पाया की उसे नोकरी से बर्खास्त करने ले लिए सम्बंधित सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है.

उपर्युक्त सर्वोच्च न्यायालय का आदेश निम्न लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है-
Miglani Vs State NCT Of Delhi Criminal Appeal No.744 Of 2019.Pdf

*निम्नदर्शित लिंक के माध्यम से एकही पेज पर भ्रष्ट प्रणाली के खिलाफ लड़ने के लिए हमारे सभी शीर्ष कानूनी जागरूकता हेतु लेखों को जरुर पढ़ें-
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* अत्यंत महत्वपूर्ण-

लोकसेवक के आपराधिक अभियोजन मामलों में सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण बिंदु-
आम लोगों को लोकसेवक के खिलाफ आपराधिक अभियोजन  की प्रक्रिया का आरंभ करते समय निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए-

१) किसी भी लोकसेवक ने अपनी प्रत्यक्ष कार्रवाई से या अपने अप्रत्यक्ष कृत्य तथा क़ानूनी प्रावधानों की जानबूझकर अवज्ञा की  है जिसके परिणामस्वरूप कोई अपराध होता है या वो इस तरह आपराधिक साजिश में भाग लेता है,  तो वह दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा १९७ (Section 197 of the Code of Criminal Procedure 1973) का संरक्षण नहीं ले सकता है.

२) लोकसेवक को सिर्फ और सिर्फ पदीय कर्तव्य के निर्वहन के कार्यों के लिए ही (official discharge of duties of public servant) दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ के धारा १९७ का संरक्षण मिलेगा अन्यथा नहीं- सर्वोच्च न्यायलय.
३) धोखाधड़ी करना या फर्जी दस्तावेज़ बनाना लोक सेवक का आधिकारिक कर्तव्य नहीं है और ना ये अपराध उसके पदीय कर्तव्य के निर्वहन के श्रेणी में (official discharge of duties of public servant) आता है और इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता १९७३  की धारा १९७ का संरक्षण लोकसेवक को ऐसे प्रकरण में नहीं मिलेगा.

भारतीय दंड संहिता १८६० (Indian Penal Code 1860) के तहत लोकसेवकद्वारा किए गए अपराधों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार हैं- (Important Provisions related to offences committed by the Public Servant under the Indian Penal Code 1860 are as follows)-
धारा १०७- किसी बात का दुष्प्रेरण-
S.107- Abetment of a thing,
धारा १२० ख, आपराधिक षड्यंत्र ,
S.120- Criminal Conspiracy,
धारा १६६- लोकसेवक जो किसी व्यक्ति को क्षतिकारित करने के लिए आशय से विधि की अवज्ञा करता है
(S.166-Public servant disobeying law, with intent to cause injury to any person),


धारा २०२- इत्तिला देने के लिए आबद्ध व्यक्तिद्वारा अपराध की इत्तिला देने का साशय लोप
(S.202- Intentional omission to give information of offence by person bound to inform),
धारा २१७- लोकसेवक को किसी भी व्यक्ति को दंड या किसी संपत्ति के समपहरण के बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा आदि.
(S.217-Public servant disobeying direction of law with intent to save person from punishment or property from forfeiture etc.).

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